मनुवाद की चाल में हम कैसे फंसते जा रहे हैं? और इसके जिम्मेदार हम खुद हैं!
आज जब भी हम अपने समाज की बदहाली, जातिवाद, असमानता और शोषण पर बात करते हैं, तो सारा दोष व्यवस्था या राजनेताओं पर मढ़ देते हैं। लेकिन क्या हमने कभी ठंडे दिमाग से बैठकर यह सोचा है कि इस व्यवस्था को पांच साल तक हमारे ऊपर राज करने का लाइसेंस देता कौन है? सच्चाई बहुत कड़वी है—इस जाल को बिछाने वाले भले ही मनुवादी हों, लेकिन इसमें खुद चलकर फंसने वाले और इसके लिए जिम्मेदार कोई और नहीं, बल्कि हम खुद हैं।
मनुवाद क्या है? यह केवल एक शब्द नहीं, एक मानसिक जाल है
सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि ‘मनुवाद’ शब्द कहाँ से आया। यह कोई आम मन की बात या धारणा नहीं है, बल्कि यह ‘मनुस्मृति’ नामक ग्रंथ की उस विचारधारा से बना है, जिसने इंसानों को बराबरी का हक देने के बजाय उन्हें ऊंच-नीच, जातियों और श्रेणियों में बांट दिया।
बाबासाहेब डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने हमें लोकतंत्र और ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ का अधिकार देकर इस मनुवादी ऊंच-नीच की दीवार को ढहाने का सबसे बड़ा हथियार दिया था। लेकिन आज के आधुनिक मनुवादियों ने हमें शारीरिक रूप से गुलाम बनाने के बजाय मानसिक रूप से गुलाम बनाने का एक नया ‘ट्रैप’ (जाल) तैयार कर लिया है, और हम हर चुनाव में इसमें फंस जाते हैं।
जाल नंबर 1: शराब और चंद रुपयों के बदले वोट बेचना
चुनाव आते ही हमारे मोहल्लों और बस्तियों में मनुवाद का सबसे गंदा खेल शुरू होता है। एक या दो रात के नशे के लिए शराब की बोतलें बांटी जाती हैं, कुछ रुपयों की गड्डियां घुमाई जाती हैं। और हम? हम यह भूल जाते हैं कि जो नेता हमें ₹500 या एक बोतल शराब देकर हमारा वोट खरीद रहा है, वह दरअसल हमारे बच्चों का भविष्य खरीद रहा है।
जब हम अपना वोट बेचते हैं, तो हम अगले पांच साल के लिए अच्छे स्कूल, मुफ़्त अस्पताल, रोजगार और अपने आत्मसम्मान को उसी शराब की बोतल में डुबो देते हैं। जो कौम बिकने को तैयार हो, उसे कोई भी खरीद सकता है। यह मनुवाद की सबसे बड़ी कामयाबी है कि उन्होंने हमें अपने ही हकों का सौदा करना सिखा दिया।
जाल नंबर 2: ‘पैर छूने’ और झूठे सम्मान की राजनीति
मनुवादी व्यवस्था का एक और पुराना और अचूक हथियार है—दिखावे का सम्मान। जो नेता आम दिनों में हमसे सीधे मुंह बात करना पसंद नहीं करते, जिनकी गाड़ियों के शीशे हमारे पास से गुजरते समय बंद हो जाते हैं, वे चुनाव आते ही हमारी बस्तियों में पैदल चलकर आते हैं। वे हमारे बुजुर्गों के पैर छूते हैं, बच्चों को पुचकारते हैं और ऐसा नाटक करते हैं मानो उनसे बड़ा शुभचिंतक कोई है ही नहीं।
हम इतने भावुक और नासमझ बन जाते हैं कि इस झूठे और मौसमी सम्मान के जाल में फंसकर अपना वोट उन्हें सौंप देते हैं। हमें यह याद रखना होगा कि जो पैर आज चुनाव जीतने के लिए छुए जा रहे हैं, कुर्सी पर बैठते ही उन्हीं पैरों के नीचे हमारी उम्मीदों और अधिकारों को कुचला जाएगा। यह संस्कार नहीं, बल्कि वोट ऐंठने की एक सोची-समझी मनुवादी चाल है।
पांच साल का दर्द और हमारी खामोशी (जूते खाता समाज)
वोट का सौदा करने के बाद या गलत और झूठे इंसानों को चुनने के बाद, हमारा समाज अगले पांच साल तक सिर्फ जूते खाता है। जी हाँ, पूरे पांच साल तक सिर्फ और सिर्फ जूते! हम बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसते हैं, नौकरियों के लिए सड़कों पर लाठियां और जूते खाते हैं, और थानों-कचहरियों में हमारा आत्मसम्मान कुचला जाता है।
लेकिन हम चाहकर भी कुछ नहीं बोल पाते, क्योंकि हम अपनी ताकत और अपनी आवाज तो पहले ही दिन चंद रुपयों या शराब के बदले बेच चुके होते हैं। हम खुद ही अपने हाथों से मनुवादी व्यवस्था को मजबूत करके पांच साल तक अपमान के जूते खाने का इंतजाम कर लेते हैं।
समाधान: अब जागने का समय है
अगर हमें मनुस्मृति की मानसिकता से उपजे इस आधुनिक मनुवाद को उखाड़ फेंकना है, तो इसकी शुरुआत हमें खुद से करनी होगी:
- बिकना बंद करो: जब तक हम बिकने के लिए तैयार रहेंगे, तब तक बाजार में खरीदार आते रहेंगे। अपने वोट की कीमत को पहचानिए, यह बाबासाहेब के संघर्षों की अमानत है।
- लालच और भावुकता से ऊपर उठें: चुनाव के समय पैर छूने वाले पाखंडियों और शराब बांटने वाले ठेकेदारों को अपनी बस्तियों से खदेड़िए।
- शिक्षा और अधिकारों पर वोट दें: जो नेता आपके बच्चों के लिए कलम, किताब, स्कूल और रोजगार की बात करे, उसे चुनिए; न कि उसे जो आपको जाति और धर्म के नाम पर बांटता हो।
याद रखिए, जब तक हम खुद अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तब तक हम इस जाल से आजाद नहीं हो सकते। मनुवाद की चाल को नाकाम करने का इकलौता तरीका यही है कि हम जागें, जागरूक बनें और अपने वोट को अपनी आने वाली नस्लों के भविष्य के लिए इस्तेमाल करें।
जय भीम! जय संविधान!