आरक्षण समीक्षा के पाखंड पर सीधी बात: पहले बैकलॉग भरिए, फिर ज्ञान बांटिए!
आजकल देश में आरक्षण पर बहस का एक नया दौर शुरू हो गया है। कोई ‘सुधार’ की आड़ में आरक्षण की धार कुंद करना चाहता है, तो कोई ‘समीक्षा’ का झुनझुना थमा रहा है। इस बहस में कई सवर्ण विचारकों के साथ-साथ सत्ता और व्यवस्था में बैठे कुछ अन्य चेहरे भी अपनी-अपनी सहूलियत के हिसाब से बयानबाजी कर रहे हैं। लेकिन इस पूरी कवायद में जो सबसे बुनियादी सवाल गायब है, उस पर खुलकर बात होना बेहद जरूरी है।
1. सवर्ण समाज हमारा ‘प्रतिनिधि’ नहीं हो सकता
सबसे पहली और स्पष्ट बात यह है कि सवर्ण समाज या उसके नुमाइंदे किसी भी सूरत में वंचितों, दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के “हितैषी या प्रतिनिधि” नहीं हो सकते। जो समाज सदियों से सत्ता, संसाधनों और सामाजिक व्यवस्था के शीर्ष पर बैठकर विशेषाधिकारों का आनंद लेता रहा हो, वह आज हमारे अधिकारों के ‘सुधार’ की रूपरेखा तय करने वाला कौन होता है?
हमारे अधिकारों, हमारी नुमाइंदगी और हमारे सामाजिक-आर्थिक सुधार की बात केवल वही कर सकता है जिसने उस सामाजिक अन्याय का दंश झेला है। जब कोई गैर-प्रतिनिधि वर्ग आरक्षण में सुधार या समीक्षा की बात करता है, तो वह ‘सुधार’ नहीं, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से अधिकारों को छीनने की कोशिश लगती है।
“जिसने कभी दर्द झेला ही नहीं, वह उसकी दवा तय करने का हक कैसे रख सकता है?”
2. अगर इतनी ही हमदर्दी है, तो पहले बैकलॉग (Backlog) पूरा कीजिए!
जो लोग या नेता आरक्षण के विरोध में खड़े होते हैं या इसमें बदलाव का राग अलापते हैं, उनसे हमारा बहुत सीधा और संवैधानिक सवाल है: “अगर आपको वाकई व्यवस्था से इतनी हमदर्दी है, तो पहले हमारा बैकलॉग पूरा करवाइए!”
आज देश की हकीकत क्या है?
उच्च शिक्षा संस्थाएं (IITs, IIMs, सेंट्रल यूनिवर्सिटीज़): इनमें प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर के हजारों स्वीकृत पद सालों से ‘उपयुक्त उम्मीदवार न मिलने’ (NFS – Not Found Suitable) के नाम पर खाली पड़े हैं।
सरकारी विभाग व रेलवे: क्लास-1, क्लास-2 से लेकर विभिन्न सरकारी विभागों में एससी, एसटी और ओबीसी के बैकलॉग के लाखों पद धूल फांक रहे हैं।
न्यायपालिका और शीर्ष नौकरशाही: यहाँ तो प्रतिनिधित्व का आंकड़ा आज भी नगण्य है।
यदि आरक्षण का विरोध करने वालों और समीक्षा की मांग करने वालों की मंशा इतनी ही साफ और ईमानदार है, तो उनकी पहली शर्त यह होनी चाहिए कि पहले यूनिवर्सिटी, कॉलेज, रेलवे और तमाम सरकारी विभागों में पड़े वर्षों पुराने बैकलॉग को 100% भरा जाए।
3. हक मारना बंद हो, पहले संवैधानिक हिस्सेदारी दो
आरक्षण कोई गरीबी उन्मूलन योजना या खैरात नहीं है; यह इस देश के संसाधनों और शासन-प्रशासन में वंचितों की संवैधानिक हिस्सेदारी (Representation) की गारंटी है। जब तक आप हमारा रुका हुआ हक (बैग्लॉग) पूरा नहीं देते, तब तक आपको आरक्षण के किसी भी पहलू पर सवाल उठाने या उसमें किसी प्रकार का बदलाव सुझाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
निष्कर्ष:
आरक्षण की समीक्षा का ढोंग रचने वालों को यह साफ समझ लेना चाहिए कि अब यह समाज जागरूक है। अब छलावे का दौर खत्म हो चुका है। यदि आपको व्यवस्था में सुधार की वाकई चिंता है, तो कागजों में सिमटे बैकलॉग को जमीन पर उतारिए, हमारी खाली पड़ी सीटों को भरिए और हमें हमारी आबादी के अनुपात में हक दीजिए—बात फिर
उसके बाद होगी!